कौन-सी थी वो ज़ुबान / जो तुम्हारे कंधे उचकाते ही / बन जाती थी / मेरी भाषा / अब क्यों नहीं खुलती / होंठों की सिलाई / कितने ही रटे गए ग्रंथ / नहीं उचार पाते / सिर्फ तीन शब्द

मुसाफ़िर...

Thursday, May 20, 2010

आत्मज्ञान तक पहुंच / समझा हूं / कि हूं / कन्फ्यूज़्ड

पिछली पोस्ट में कुछ कविताएं आपके लिए हाज़िर की थीं...वही सिलसिला जारी है...


सुंदरता पर / निश्वास / छोड़ता हुआ भी / तन्मय कब तक रहता मैं?
आदमखोर चरित्र को दरकिनार कर / सत्यवसन रहता मैं...
नहीं झेल सकता मैं अब एक भी मुखौटे वाला चेहरा
उतार डाले सभी  आवरण
नग्न यथार्थ की धरा पर हूं खड़ा
हूं तुम्हारे सामने।
सच की सज़ा क्या मिलेगी?
आत्महत्या की तरह फांसी का फंदा /
या कि तुम दोगे अभयदान?
अच्छा होगा तुम फिर लटका दो सलीब पर...
कम से कम हो सकूंगा
ईसा और सुकरात की तरह
वे भी तो हो गए थे अमर...
नहीं जानता,
क्या साबित करना चाहता हूं?
सच बोलने की सज़ा पाना चाहता हूं...
या / कि / झूठ बोलने का लाइसेंस!
आत्मज्ञान जगाना है मुझे,
अपने / आप / अपने में / मुझको / मुझमें
या कि /
महान होने के मुखौटे पहन,
कुछ और विशिष्ट होने की होड़ में,
होना है शामिल
(2001, जालंधर)

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